चिट्टी का इंतजार (भाग-4)

भाग चार

चिट्ठी का इंतजार

उस दिन डाकिया चाचा की साइकिल गली में बहुत देर तक खड़ी रही, घंटी नहीं बजी, यह छोटी-सी बात थी, पर रामदीन के घर के लिए यह अशुभ संकेत बन गई।

अम्मा दरवाज़े पर ही खड़ी थीं, उनकी आँखें साइकिल पर टिकी थीं पर दिल किसी और ही दिशा में भाग रहा था।

डाकिया चाचा ने धीरे-धीरे थैला उतारा।
आज उनके कंधे और झुके हुए थे, जैसे बोझ चिट्ठियों का नहीं, किसी अनहोनी की खबर का हो।

थैले से उन्होंने एक लिफ़ाफ़ा निकाला जो अब सफेद नहीं था वह हल्का भूरा था जिसके ऊपर लाल सरकारी मुहर लगी थी।

अम्मा का हाथ अपने-आप दीवार को थामने लगा, बाबूजी आगे बढ़े, उनकी आवाज़ निकली, पर बहुत धीमी।

“किसकी चिट्ठी है, चाचा?”

डाकिया चाचा ने आँखें उठाईं।
पहली बार उनके चेहरे पर असहायता थी।

“शहर से है…”

बस इतना ही।

उस एक वाक्य में पूरा घर सिमट गया।

लिफ़ाफ़ा हाथ में लिया गया पर खोला नहीं गया।

कभी-कभी चिट्ठी खोलने से पहले आदमी खुद को तैयार करता है।

अम्मा आँगन में आकर बैठ गईं, चौकी पर नहीं, ज़मीन पर जैसे खुद को नीचे ले आना चाहती हों, बाबूजी ने कांपते हाथों से लिफाफा खोला, लिफाफे का कागज मोटा था और चिट्ठी मे लिखी भाषा सख़्त थी।

“सूचित किया जाता है कि…” आगे शब्द धुंधले हो गए "मोहन अस्पताल में भर्ती था
स्थिति गंभीर, इलाज जारी, पर कोई अपना साथ नहीं।"

बस इतना ही लिखा था।

बाबूजी ने पढ़ना रोक दिया, तभी अम्मा ने पूछा.

“क्या लिखा है?”

माँ सवाल ऐसे पूछती है जैसे जवाब पहले से जानती हो।

बाबूजी ने धीरे से कहा, “बीमार है…”

अम्मा ने सिर हिलाया। “हुम्म.. मुझे पता था।”

चिट्ठी में लिखें शब्दों में जीत नहीं थी, सिर्फ थकान थी।

खबर आग की तरह गांव में फैल गई।

पड़ोसनें आईं, किसी ने पानी दिया, किसी ने दिलासा।

“भगवान सब ठीक करेगा।”

“ऐसा ही होता है शहर में।”

पर अम्मा को कोई आवाज़ नहीं सुनाई दे रही थी, उनका मन अब शहर में था, उस बिस्तर के पास, जहाँ उनका बेटा अकेला पड़ा होगा।

उस रात अम्मा ने खाना नहीं बनाया,वे बाबूजी के सामने बैठ गईं।

“मुझे जाना है।”

बाबूजी चौंक गए।

“कहाँ?”

“मोहन के पास।”

कमरे में सन्नाटा भर गया।

बाबूजी ने कहा- “शहर बहुत दूर है।
हम अकेले कैसे जाएँगे?”

अम्मा ने पहली बार आवाज़ ऊँची की।

“तो क्या चिट्ठी से ही बेटे को बचाएँगे?”

यह सवाल नहीं था, यह माँ का आदेश था।

असहाय बाबूजी बाहर निकल गए, आँगन में खड़े होकर उन्होंने आसमान की ओर देखा,
पहली बार वे टूटे हुए लगे।

“मैं उसे नहीं बचा पाया,” उन्होंने खुद से कहा।

पिता अक्सर यह भूल जाते हैं कि वे भगवान नहीं होते।

सुबह होते ही बाबूजी पैसे जुटाने में लग गए,
किसी से उधार, किसी से मदद, पर शहर दूर था, टिकट का इंतज़ाम.

अम्मा हर मिनट गिन रही थीं, हर बीतता पल
उन्हें बेटे से दूर ले जा रहा था।

डाकिया चाचा उस दिन दोबारा आए, उन्होंने धीरे से कहा,- “एक और चिट्ठी थी… पर मैं देने से डर रहा था।”

उन्होंने थैले से एक और लिफ़ाफ़ा निकाला।

इस बार लिफाफे पर अस्पताल की मुहर थी।

अम्मा ने लिफ़ाफ़ा नहीं लिया।

“पढ़ दो,”- उन्होंने कहा।

डाकिया चाचा ने पढ़ा —

“मरीज़ की हालत नाज़ुक है परिजन शीघ्र पहुँचें।”

यह “शीघ्र” शब्द अम्मा के कानों में हथौड़े की तरह पड़ा।

ट्रेन अगले दिन की थी, अम्मा पूरी रात जागती रहीं, वे मोहन की बचपन की चीज़ें निकालती रहीं, कभी उसकी चप्पल, कभी उसकी किताब।

मानो वो हर चीज़ से बात करती रहीं हो।

“बस थोड़ी देर और रुक जा बेटा…”

यह प्रार्थना नहीं थी, यह उनकी विनती थी।

सुबह होने से पहले एक और दस्तक हुई।

डाकिया चाचा नहीं थे, एक पुलिस वाला था।

हाथ में वही सरकारी लिफ़ाफ़ा, पर अब शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।

अम्मा समझ गईं माँ को किसी अनहोनी
खबर की ज़रूरत नहीं होती।

वे ज़मीन पर बैठ गईं,आवाज़ नहीं निकली, 
बस आँखें एक बिंदु पर टिक गईं, और उसी क्षण रामदीन के घर का समय रुक गया।

क्रमशः-

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