चिट्टी का इंतजार (भाग-3)
भाग तीन
"चिट्ठी का इंतजार"
जहाँ आशा और भय बराबर खड़े होते हैं
जहाँ शब्द टूटने लगते हैं, और मौन बोलने लगता है।
अब चिट्ठियाँ सिर्फ ख़बर नहीं लाती थीं, वे मौन संकेत लाने लगी थीं, रामदीन के घर में सब कुछ पहले जैसा ही था, वही आँगन, वही चौकी, वही पीपल की छाया, पर उस स्थिरता के भीतर कुछ टूट रहा था, धीरे-धीरे, बिना आवाज किए।
मोहन की चिट्ठियाँ अब छोटी हो गई थीं,
पहले जहाँ पूरा पन्ना भर जाता था,
अब आधा भी नहीं भरता।
“मैं ठीक हूँ” अब “ठीक हूँ” बन गया था।
बाबूजी इस बदलाव को समझ रहे थे, वे चिट्ठी पढ़ते समय हर विराम पर रुकते।
“जब आदमी ठीक नहीं होता,” एक दिन उन्होंने कहा, “तब उसे लिखने का मन नहीं करता।”
अम्मा ने कोई जवाब नहीं दिया, वे उस दिन आँगन में बैठकर धूप की ओर पीठ किए रहीं
माँ को सच्चाई तब भी पता चल जाती है, जब शब्द झूठ बोलने लगें।
डाकिया चाचा भी अब पहले जैसे नहीं थे,
पहले आते थे तो दो बातें ज़रूर करते
अब चिट्ठी पकड़ाकर चुपचाप चले जाते।
एक दिन बाबूजी ने पूछ ही लिया,
“सब ठीक तो है ना, चाचा?”
डाकिया चाचा ने थैले की पट्टी कसते हुए कहा, “शहर से आने वाली चिट्ठियाँ… अब जल्दी नहीं पहुँचतीं।” यह कहकर उन्होंने नज़रें फेर लीं।
अम्मा ने यह सब देखा, माँ आँखों से नहीं, हवा से बातें समझ लेती है।
एक दिन चिट्ठी आई, लिफ़ाफ़ा मोटा नहीं था,
पर भारी था।
मोहन ने पहली बार “बीमारी” शब्द लिखा था।
“अम्मा, सीने में अक्सर दर्द रहता है, डॉक्टर ने आराम कहा है, पर काम छोड़ नहीं सकता।”
बाबूजी ने चिट्ठी बंद कर दी।
“यह लड़का,” उन्होंने गहरी साँस लेते हुए कहा, “अपनी जान से ज़्यादा काम को मानता है।”
अम्मा चुपचाप उठीं, रसोई में गईं, और पहली बार उनके हाथ से रोटी जल गई, उस रात अम्मा सो नहीं पाईं, हर करवट पर उन्हें लगता, मोहन खाँस रहा है।
सुबह होते ही उन्होंने चिट्ठी लिखी।
“बेटा, काम छोड़ दे, घर लौट आ, हम खेती से ही गुज़ारा कर लेंगे।”
यह पहली बार था, जब माँ ने बेटे को वापस बुलाया, चिट्ठी लिखते समय उनकी कलम काँप रही थी, कुछ शब्द टेढ़े हो गए, वे जानती थीं, यह आग्रह नहीं, आख़िरी विनती हो सकती है।
कुछ दिन बाद कस्बे में खबर आई, शहर के उसी इलाके में जहाँ मोहन काम करता था,
कई मज़दूर बीमार पड़ गए थे।
किसी ने कहा — “धुआँ ज़्यादा है।”
किसी ने कहा — “रहने की जगह ठीक नहीं।”
अम्मा हर बात सुनकर और ज़्यादा चुप होती गईं, उन्होंने एक दिन भगवान से पूछा,
“अगर शहर इतना ज़हरीला है, तो हमारे बच्चे वहाँ क्यों जाते हैं?”
भगवान ने कोई जवाब नहीं दिया, पर माँ ने पूछना नहीं छोड़ा।
एक चिट्ठी आई, पर तारीख पुरानी थी, दो हफ़्ते पहले की।
मोहन ने लिखा था —
“अम्मा, अब काम करना मुश्किल हो रहा है,
साँस जल्दी फूल जाती है, पर घर लौटने का किराया नहीं है।”
अम्मा का हाथ काँप गया, किराया…
इतना छोटा शब्द, इतनी बड़ी दीवार।
बाबूजी ने तुरंत कहा, “मैं पैसे भेजता हूँ।”
अम्मा ने सिर हिलाया- “भेजो, पर देर न हो जाए।”
बाबूजी ने शहर मनीऑर्डर भेजा।
फॉर्म भरते समय उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, वह पैसा सिर्फ नोट नहीं था, वह पिता की उम्र, माँ की नींद, और खेत की आख़िरी कमाई थी।
मनीऑर्डर भेजने के बाद अम्मा रोज़ डाकिए से पूछतीं — “कोई खबर?”
डाकिया चाचा सिर हिलाते- “अभी नहीं।”
मायूसी और गहरी हो जाती
मोहन की तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया, न चिट्ठी, न मनीऑर्डर की पावती।
घर में सन्नाटा गहरा होता गया। हम बच्चे भी अब शोर नहीं करते थे, खिलौने भी बिना आवाज के चलते थे, अम्मा अब चौकी पर नहीं बैठती थीं, वे दरवाज़े के पास खड़ी रहतीं, जैसे अगर बैठ गईं, तो बेटा लौट नहीं पाएगा।
एक रात अम्मा ने सपना देखा, मोहन गली में खड़ा है, पर आवाज़ नहीं निकाल पा रहा।
वह हाथ हिला रहा है, पर कदम नहीं बढ़ा पा रहा, अम्मा चीखकर उठीं और मोहन की चिंता में जगती रही, सुबह होते ही उन्होंने एक और चिट्ठी लिखी, इस बार शब्द कम थे।
“बेटा, अगर यह चिट्ठी मिले, तो बस एक जवाब भेज देना।”
माँ कभी ज़्यादा नहीं माँगती, उसे बस एक निशानी चाहिए।
दिन बीतते गए, डाकिया चाचा आते, पर उस घर का दरवाज़ा नहीं खटखटाते, अम्मा अब स्याही नहीं बदलती थीं वही पुरानी दवात
वही कलम, जैसे स्याही खत्म हुई, वैसे ही जीवन भी।
और कहीं दूर शहर में, मोहन अपने संघर्ष को
चिट्ठियों में नहीं, खामोशी में जी रहा था।
क्रमशः-4
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