आप 2018 के बाद से अब तक क्यों परेशान हैं..?


👉 व्यक्ति जब भी दुखी होता है, तो मन में निरंतर बोझ बना रहता है, विशेषकर तब, जब उसके कार्य अचानक बिगड़ने लगें और हर दिशा से नुकसान होने लगे। ऐसी स्थिति में वह स्वयं को हर जगह से बेबस समझने लगता है।

विशेष रूप से 2018 के बाद से यदि लगातार हानियाँ हो रही हों, तो यह संकेत करता है कि जातक की दशा–गोचर उसकी सोच और समझ के विपरीत चल रहे हैं। परिणामस्वरूप उसके भीतर भटकाव की स्थिति बन जाती है। वह जिस भी कार्य में हाथ डालता है, असफलता मिलने लगती है।

मन अत्यधिक परेशान रहता है, लेकिन जातक अपनी स्थिति सबके सामने प्रकट नहीं करता। वह भीतर ही भीतर मानसिक रूप से बहुत पीड़ित होता जाता है।
जब भी जातक का मन दुखी होता है या वह पीड़ा में होता है, तो उसके मुख से बार-बार “माँ” शब्द निकलता है—चाहे वह अपनी जननी हो या देवी माँ। इसी कारण चंद्रमा को मन और माता का कारक माना गया है।

👉 जब चंद्रमा पीड़ित होता है, तो जातक को एक के बाद एक दुख मिलने लगते हैं। एक दुख समाप्त नहीं होता कि दूसरा सामने खड़ा हो जाता है। वर्तमान समय में अधिकांश कुंडलियों में चंद्र किसी न किसी रूप में पीड़ित दिखाई देता है। चंद्र पीड़ित होने पर, सुख उपलब्ध होने के बाद भी जातक उसका भोग नहीं कर पाता। वह किसी न किसी कारण से सदैव परेशान ही रहता है। विशेष रूप से उसमें दूसरों की खुशी देखकर अधिक दुखी होने की प्रवृत्ति पाई जाती है—अपने पास सब कुछ होते हुए भी वह संतुष्ट नहीं होता।

👉 ऐसे जातक के घर में माता या पत्नी—दोनों में से कोई न कोई दुखी अवश्य रहती है, क्योंकि चंद्र और शुक्र एक-दूसरे के पूरक ग्रह हैं। चंद्र माता का प्रतीक है और शुक्र पत्नी का। माता कभी पत्नी रही होती है और पत्नी आगे चलकर माता बनती है—दोनों ही जन्मदात्री हैं।

👉 इसी प्रकार चतुर्थ भाव और सप्तम भाव भी आपस में गहराई से जुड़े होते हैं।
यदि ये दोनों भाव पीड़ित हों, तो जातक धन से भले ही समृद्ध हो, पर घर-परिवार से सुखी नहीं होता। चतुर्थ भाव से माता, भूमि, वाहन, गृह-सुख और वंश का सुख देखा जाता है। इस भाव का मुख्य कारक चंद्रमा है, किंतु हर कुंडली में भाव के साथ-साथ उसके भावेश का भी विचार किया जाता है।

👉 यदि चतुर्थ भाव का स्वामी शनि या मंगल हो और वह पीड़ित अवस्था में हो, तो जातक घर से दूर रहता है, कार्यक्षेत्र में सुख नहीं पाता और कर्ज का बोझ अधिक रहता है। स्पष्ट है कि जब चतुर्थ भाव का स्वामी ही पीड़ित होगा, तो चंद्र भी कमजोर होगा—फलस्वरूप माता और पत्नी दोनों ही दुखी मिलती हैं।

👉 चतुर्थ भाव में मंगल होने पर प्रायः देखा गया है कि जातक का धन दूसरों के हाथ चला जाता है। जिसे वह कर्ज देता है, वह लौटाता नहीं, और जिनसे वह लेता है, उन्हें चुकाने में अत्यधिक संघर्ष करना पड़ता है।
ऐसे लोग घर की ज़िम्मेदारियों के कारण कर्ज लेते हैं और उसी में फँस जाते हैं।

👉 यदि चतुर्थ भाव में शनि पीड़ित हो, या उसके साथ राहु, केतु या सूर्य हो, तो घर तो मिलता है, पर उस घर में बीमारियाँ और मानसिक अशांति बनी रहती है। घर बनवाने वाला व्यक्ति स्वयं घर का सुख नहीं भोग पाता—वह कमाने के चक्कर में इधर-उधर भटकता ही रहता है।

👉 यदि शुक्र भी पीड़ित हो, तो पत्नी के साथ जीवन प्रायः किराये के मकान में ही बीतता है।
जिनकी कुंडली में शनि कमजोर होता है, उनके घर बनने में बहुत विलंब होता है। भले ही वर्षों पहले भूमि खरीद ली हो।
मंगल भूमि देता है, लेकिन मकान निर्माण के लिए शनि का प्रबल होना आवश्यक है।
जब शनि कमजोर होता है, तो न तो साहस बनता है और न ही स्थिर नौकरी—आज काम है, कल नहीं।

👉 आज के समय में अधिकांश लोग घर बनाने के लिए कर्ज में डूबे हुए हैं और उनमें से कई लोग किस्त, कामकाज और मानसिक तनाव से परेशान दिखाई देते हैं।

👉 यदि चतुर्थ भाव में राहु हो, तो घर का वातावरण बिल्कुल अलग होता है।
ऐसे व्यक्ति बड़ी-बड़ी बातें करने वाले, दिखावे में आगे रहते हैं—भले ही घर में खाने को न हो।
राहु शुभ हो, तब भी व्यक्ति एक बड़ी गलती के कारण जीवन में सब कुछ गँवा सकता है।
ऐसे घरों में मानसिक परेशानी और विशेषकर स्त्रियों का मानसिक उत्पीड़न अधिक देखा जाता है, जिसका मुख्य कारण नशा और धन बनता है।
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कुंडली में चंद्रमा (मन, माता, भावनाएँ, मानसिक शांति) कब और कैसे पीड़ित होता है—इसे ज्योतिष की भाषा में स्पष्ट रूप से समझिए 👇
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🌙 कुंडली में चंद्र पीड़ित होने के मुख्य कारण

1️⃣ पाप ग्रहों की युति से

यदि चंद्र की युति इन ग्रहों से हो जाए तो वह पीड़ित माना जाता है—

शनि → अवसाद, अकेलापन, मानसिक बोझ

मंगल → चिड़चिड़ापन, क्रोध, मानसिक अशांति

राहु / केतु → भ्रम, भय, मानसिक अस्थिरता

सूर्य (अमावस्या योग) → आत्मविश्वास की कमी, माँ से दूरी

👉 विशेषकर राहु–चंद्र युति को चंद्र ग्रहण योग कहा जाता है, यह सबसे अधिक मानसिक कष्ट देता है।
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2️⃣ पाप ग्रहों की दृष्टि से

यदि चंद्र पर इन ग्रहों की दृष्टि पड़े—

शनि की 3री, 7वीं, 10वीं

मंगल की 4थी, 7वीं, 8वीं

राहु–केतु की 5वीं, 7वीं, 9वीं

तो भी चंद्र कमजोर व पीड़ित हो जाता है।
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3️⃣ नीच राशि में चंद्र

चंद्र वृश्चिक राशि में नीच होता है।
यदि वहाँ उसे शुभ ग्रहों का बल न मिले, तो जातक—

अत्यधिक संवेदनशील

संदेहपूर्ण

मानसिक तनावग्रस्त
होता है।
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4️⃣ अमावस्या तिथि में जन्म

सूर्य और चंद्र एक ही राशि/डिग्री में हों

चंद्र पूर्णतः दब जाए

👉 इसे अमावस्या योग कहते हैं
ऐसे जातक को आत्मिक असंतोष, माँ से भावनात्मक दूरी और निर्णय क्षमता की कमी रहती है।
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5️⃣ पाप भावों में स्थिति

यदि चंद्र इन भावों में हो—

6वाँ भाव → रोग, चिंता

8वाँ भाव → भय, आकस्मिक दुख

12वाँ भाव → नींद की समस्या, अकेलापन

तो मानसिक कष्ट बढ़ते हैं।
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6️⃣ चंद्र की कमजोर अवस्था

अस्त (सूर्य के बहुत पास)

कम अंशों में स्थित

शत्रु राशि में (मकर, कुंभ)

अशुभ नवांश में

👉 इससे मन स्थिर नहीं रहता।
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7️⃣ दशा–अंतरदशा में पीड़ा

चंद्र की दशा/अंतर में पाप ग्रह सक्रिय हों

या चंद्र पीड़ित अवस्था में दशा दे

तो उस समय मानसिक, पारिवारिक व भावनात्मक संकट बढ़ता है।
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8️⃣ गोचर में चंद्र पीड़ा

शनि की साढ़ेसाती

ढैय्या

चंद्र से शनि/राहु का कठिन गोचर

👉 मन अशांत, निर्णय गलत, भावनात्मक टूटन होती है।
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🌼 पीड़ित चंद्र के लक्षण (पहचान)

बिना कारण चिंता

माँ या पत्नी का दुखी होना

नींद न आना

दूसरों की खुशी से मन दुखी होना

बार-बार “माँ” का स्मरण

घर में रहते हुए भी सुख न मिलना
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🪔 संक्षिप्त उपाय (संकेत मात्र)

सोमवार व्रत

शिव पूजन

चावल, दूध का दान

“ॐ सोम सोमाय नमः” मंत्र जप

माता का सम्मान व सेवा

— श्री वैदिक ज्योतिष

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