16. असफलता से डर क्यों लगता है?


📖 “भयाद्रणादुपरतं” (भावार्थ – भय व्यक्ति को कर्म से रोक देता है)
🪔 भय रोकता है।
🌼 डर के कारण कई प्रतिभाएँ दब जाती हैं।
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असफलता का डर मनुष्य के जीवन का सबसे सूक्ष्म और सबसे शक्तिशाली भय है। यह ऐसा भय है जो दिखाई नहीं देता, पर भीतर ही भीतर व्यक्ति की सोच, निर्णय और कर्मशक्ति को जकड़ लेता है। अक्सर हम असफलता से इतना डरते हैं कि प्रयास करने से पहले ही हार मान लेते हैं। प्रश्न यह नहीं है कि असफलता क्यों आती है, बल्कि यह है कि असफलता से डर क्यों लगता है? इस प्रश्न का उत्तर मन, समाज, संस्कार और आत्मबोध—चारों स्तरों पर छिपा है।

1. मन की संरचना और असफलता का भय

मन स्वभाव से सुख चाहता है और दुःख से बचना चाहता है। असफलता को मन दुःख, अपमान, हानि और पीड़ा से जोड़ लेता है। जैसे ही असफलता का विचार आता है, मन भविष्य की नकारात्मक कल्पनाएँ करने लगता है—
“लोग क्या कहेंगे?”
“अगर हार गया तो मेरी इज्जत क्या रह जाएगी?”
“अगर मैं सफल न हुआ तो मेरा मूल्य क्या है?”

यहीं से भय जन्म लेता है। वास्तव में हम असफलता से नहीं, असफलता से जुड़ी कल्पनाओं से डरते हैं।

2. समाज और तुलना की संस्कृति

हमारा समाज सफलता को पूजता है और असफलता को दोष मानता है। बचपन से हमें सिखाया जाता है कि अच्छे अंक लाओ, पहले आओ, जीतों—तभी तुम योग्य हो। परिणाम यह होता है कि व्यक्ति अपनी पहचान को परिणाम से जोड़ लेता है।
अगर सफलता = मैं अच्छा हूँ
तो
असफलता = मैं बेकार हूँ

यही सोच भय को जन्म देती है। समाज तुलना करना सिखाता है—पड़ोसी का बेटा आगे निकल गया, दोस्त सफल हो गया, रिश्तेदार तरक्की कर गया। इस तुलना में असफलता केवल व्यक्तिगत नहीं रहती, वह सामाजिक अपमान बन जाती है।

3. आत्मसम्मान और अहंकार का भय

असफलता का डर वास्तव में अहंकार का डर भी है। अहंकार चाहता है कि मैं सही दिखूँ, मैं श्रेष्ठ दिखूँ, मैं हारने वाला न दिखूँ।
असफलता अहंकार को चोट पहुँचाती है।
इसलिए कई लोग प्रयास ही नहीं करते, ताकि हारने की नौबत ही न आए। वे कहते हैं—
“मैंने कोशिश ही नहीं की थी।”
यह वाक्य अहंकार की ढाल है, पर आत्मा की हार है।

4. संस्कार और पूर्व अनुभव

जिन लोगों को बचपन में गलती पर डांट, अपमान या दंड मिला होता है, उनके मन में असफलता = सजा का संस्कार बैठ जाता है।
ऐसे लोग जोखिम लेने से डरते हैं।
वे सुरक्षित रास्ता चुनते हैं, चाहे उसमें आत्मसंतोष न हो।
पूर्व असफल अनुभव यदि बिना समझ के दबा दिए जाएँ, तो वे भविष्य में भय बनकर लौटते हैं।

5. शास्त्रीय दृष्टि से भय

गीता में भय को अज्ञान का पुत्र कहा गया है। जब व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर, पद और परिणाम से जोड़ लेता है, तब भय उत्पन्न होता है।
📖 “अभयं सत्त्वसंशुद्धिः” — अभय होना दिव्य गुण है।
जब तक व्यक्ति कर्म को अपना धर्म न मानकर परिणाम से जोड़ता है, तब तक भय रहेगा।
कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
“कर्म करो, फल की चिंता मत करो।”
क्योंकि फल पर अधिकार नहीं, कर्म पर है।

6. भय कैसे प्रतिभा को दबा देता है

इतिहास गवाह है कि दुनिया की सबसे बड़ी खोजें, रचनाएँ और परिवर्तन असफलताओं की कोख से जन्मे हैं।
पर भय व्यक्ति को प्रयोग से रोक देता है।
वह कहता है—
“अगर मैं असफल हो गया तो?”

इस “अगर” में कितनी ही संभावनाएँ मर जाती हैं।
कितने कलाकार मंच पर आने से पहले ही रुक जाते हैं।
कितने उद्यमी विचार को कागज से बाहर नहीं लाते।
कितने विद्यार्थी अपने सपनों के विषय चुनने से डर जाते हैं।

प्रतिभा का सबसे बड़ा शत्रु असफलता नहीं, असफलता का भय है।

7. असफलता का वास्तविक अर्थ

असफलता कोई अंतिम सत्य नहीं है।
वह केवल यह बताती है कि यह तरीका काम नहीं आया।
असफलता सीख है, दंड नहीं।
जो व्यक्ति असफलता को शिक्षक मान लेता है, उसके लिए भय धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

गीता के अनुसार पतन नहीं, केवल अनुभव होते हैं। आत्मा न कभी हारती है, न गिरती है।

8. भय से मुक्ति का मार्ग

1. परिणाम से दूरी – कर्म पर ध्यान दें, फल ईश्वर पर छोड़ें।

2. तुलना का त्याग – आपकी यात्रा आपकी है।

3. गलती को अनुमति दें – गलती विकास का द्वार है।

4. स्व-स्वीकृति – आप परिणाम से अधिक मूल्यवान हैं।

5. आध्यात्मिक दृष्टि – जब आत्मा से जुड़ते हैं, भय स्वतः क्षीण होता है।

9. निष्कर्ष

असफलता से डर लगना स्वाभाविक है, पर उस डर में जीना आवश्यक नहीं। भय हमें रोकता है, सीमित करता है और भीतर की अग्नि को बुझा देता है।
जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि उसका मूल्य जीत-हार से नहीं, कर्म और चेतना से है—तब भय का बंधन टूटने लगता है।

🌼 याद रखिए—
जो डर के कारण रुका, उसने पहले ही हार मान ली।
और जो गिरने को तैयार हुआ, वही उड़ने का साहस जुटा पाया।

भय छोड़िए, कर्म कीजिए—यही जीवन का सत्य है।

क्रमशः 

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