15. युवा तुलना में क्यों जलता है?
📖 श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः (भगवद्गीता 3.35)
🪔 अपना मार्ग श्रेष्ठ है।
🌼 सबकी घड़ी अलग समय दिखाती है।
आज का युवा सबसे अधिक जिस मानसिक आग में जल रहा है, वह है तुलना की आग। यह आग बाहर से नहीं, भीतर से उठती है। मोबाइल स्क्रीन, सोशल मीडिया, प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाएँ और अधीर मन—सब मिलकर युवा के भीतर यह भाव भर देते हैं कि “दूसरा आगे क्यों है और मैं पीछे क्यों?” यहीं से ईर्ष्या, कुंठा, हीनभावना और आत्म-संदेह जन्म लेते हैं।
तुलना की जड़: अधीरता और असंतोष
युवा अवस्था ऊर्जा, सपनों और आकांक्षाओं से भरी होती है। लेकिन जब परिणाम तुरंत नहीं मिलते, तो मन अधीर हो जाता है। दूसरे की सफलता देखकर यह लगता है कि वह कम समय में आगे निकल गया, जबकि स्वयं की यात्रा लंबी और कठिन है। यहीं से तुलना शुरू होती है।
तुलना असल में अपने वर्तमान से असंतोष का नाम है। जब व्यक्ति अपने प्रयासों, अपने स्वभाव और अपनी गति को स्वीकार नहीं कर पाता, तब वह दूसरों के परिणामों को अपना मापदंड बना लेता है।
सोशल मीडिया: तुलना का ईंधन
आज का युवा लगातार दूसरों की “हाइलाइट रील” देख रहा है—कोई विदेश में है, कोई महंगी कार में, कोई ऊँचे पद पर। लेकिन वह यह नहीं देखता कि यह सिर्फ एक क्षण का दृश्य है, पूरी कहानी नहीं।
सोशल मीडिया तुलना को स्वाभाविक बना देता है। वहाँ संघर्ष नहीं दिखता, सिर्फ उपलब्धि दिखती है। इससे युवा को लगता है कि वह पीछे रह गया है, जबकि सच्चाई यह है कि हर जीवन की लड़ाई अलग होती है।
अपेक्षाओं का बोझ
युवा केवल अपनी तुलना नहीं करता, समाज भी तुलना करता है—रिश्तेदारों से, पड़ोसियों से, सहपाठियों से।
“उसका बेटा तो IAS बन गया…”
“वह तो विदेश चला गया…”
ऐसी बातें युवा के मन में गहरी चोट करती हैं। वह स्वयं को अपने माता-पिता की उम्मीदों के तराजू पर तौलने लगता है। जब अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं, तो आत्मग्लानि और जलन जन्म लेती है।
गीता का दृष्टिकोण: अपना धर्म
भगवद्गीता का यह श्लोक अत्यंत गहरा संदेश देता है—
“श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः”
अर्थात, गुणों से रहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, दूसरों का धर्म चाहे कितना ही अच्छा क्यों न दिखे।
यहाँ “धर्म” का अर्थ केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि स्वभाव, क्षमता और जीवन-पथ है। हर व्यक्ति का स्वधर्म अलग है। किसी का मार्ग तेज है, किसी का स्थिर। किसी को जल्दी फल मिलता है, किसी को देर से। लेकिन अपना मार्ग छोड़कर दूसरे का अनुकरण करना आत्म-विनाश का कारण बनता है।
सबकी घड़ी अलग समय दिखाती है
यह पंक्ति आज के युवा के लिए सबसे बड़ा सत्य है।
किसी की सफलता 20 की उम्र में आती है, किसी की 40 में। किसी का संघर्ष दिखता नहीं, किसी का फल देर से मिलता है।
यदि एक किसान आम का पेड़ लगाता है और दूसरा केले का, तो दोनों से एक ही समय पर फल की अपेक्षा करना मूर्खता है। आम का पेड़ समय लेता है, लेकिन जब फल देता है, तो पीढ़ियों तक देता है।
तुलना से जन्म लेने वाली समस्याएँ
1. आत्मविश्वास की कमी – युवा स्वयं को कमतर समझने लगता है।
2. ईर्ष्या और द्वेष – दूसरे की खुशी खटकने लगती है।
3. अवसाद और तनाव – मन हमेशा बेचैन रहता है।
4. गलत निर्णय – जल्दबाज़ी में मार्ग बदल लेना।
5. स्वयं से दूरी – व्यक्ति अपनी पहचान भूलने लगता है।
समाधान: तुलना से संतुलन तक
स्वयं से तुलना करें: आज मैं कल से बेहतर हूँ या नहीं?
प्रक्रिया पर ध्यान दें, परिणाम पर नहीं: परिणाम समय से आते हैं।
सोशल मीडिया सीमित करें: हर दिखने वाली सफलता सत्य नहीं होती।
अपने गुण पहचानें: ईश्वर ने हर किसी को अलग क्षमता दी है।
धैर्य रखें: समय सबसे बड़ा शिक्षक है।
निष्कर्ष
युवा तुलना में इसलिए जलता है क्योंकि वह अपने समय, अपने मार्ग और अपने स्वभाव पर विश्वास खो देता है। गीता हमें सिखाती है कि दूसरे की दौड़ देखने से अच्छा है अपनी चाल को समझना।
जब युवा यह स्वीकार कर लेता है कि “मेरा मार्ग अलग है, मेरी गति अलग है”, तब तुलना की आग बुझने लगती है और आत्मविश्वास की लौ जल उठती है।
याद रखिए—
आप पीछे नहीं हैं, आप बस अपने समय पर चल रहे हैं।
और जो अपने समय को समझ लेता है, वही सच में सफल होता है।
क्रमशः
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