13. लक्ष्य स्पष्ट क्यों नहीं रहता?


📖 श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम् (भगवद्गीता 4.39)

🪔 श्रद्धा से स्पष्टता आती है।
🌼 बिना विश्वास के दिशा नहीं मिलती।

मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ा प्रश्न अक्सर यह नहीं होता कि क्या करना है, बल्कि यह होता है कि किस दिशा में जाना है। बहुत से लोग मेहनती होते हैं, प्रतिभाशाली होते हैं, अवसर भी उनके पास होते हैं, फिर भी उनका लक्ष्य धुंधला बना रहता है। वे शुरू तो बहुत उत्साह से करते हैं, पर कुछ समय बाद भ्रम, निराशा और असमंजस में घिर जाते हैं। इसका मूल कारण बाहर नहीं, भीतर छिपा होता है—और वह कारण है श्रद्धा का अभाव।

भगवद्गीता का यह गूढ़ सूत्र—“श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्”—केवल धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि जीवन प्रबंधन का गहन सिद्धांत है। इसका अर्थ है कि ज्ञान, स्पष्टता और विवेक उसी को प्राप्त होता है, जिसके भीतर श्रद्धा होती है। यहाँ श्रद्धा का अर्थ केवल किसी देवता या ग्रंथ में विश्वास नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य, अपने कर्म और अपने अस्तित्व पर भरोसा है।

आज का मनुष्य सूचना से भरा है, लेकिन समझ से खाली होता जा रहा है। उसके पास विकल्पों की भरमार है, पर निर्णय की शक्ति कमजोर है। वह हर दिन नए विचार सुनता है, नए लक्ष्य देखता है, दूसरों की सफलता से प्रभावित होता है और धीरे-धीरे अपना स्वयं का लक्ष्य खो देता है। जब श्रद्धा नहीं होती, तो मन बाहर की आवाज़ों से संचालित होने लगता है। तब लक्ष्य अपना नहीं रहता, बल्कि उधार का हो जाता है—और उधार का लक्ष्य कभी स्पष्ट नहीं होता।

लक्ष्य की अस्पष्टता का पहला कारण है आत्मविश्वास की कमी। जब व्यक्ति स्वयं पर विश्वास नहीं करता, तो वह अपने निर्णयों पर भी भरोसा नहीं कर पाता। वह बार-बार सोच बदलता है, दिशा बदलता है, और हर बार यही मानता है कि शायद यह रास्ता सही नहीं। वास्तव में समस्या रास्ते में नहीं होती, समस्या उस विश्वास में होती है जो रास्ते पर चलने के लिए चाहिए।

दूसरा बड़ा कारण है मन की चंचलता। गीता कहती है—चञ्चलं हि मनः। बिना श्रद्धा के मन टिकता नहीं। आज कुछ और अच्छा लगता है, कल कुछ और। कभी धन को लक्ष्य मान लेते हैं, कभी पद को, कभी नाम को। लेकिन जब श्रद्धा नहीं होती, तो लक्ष्य आत्मा से नहीं जुड़ता, केवल इच्छा से जुड़ता है। इच्छा बदलती रहती है, इसलिए लक्ष्य भी बदलता रहता है।

श्रद्धा का अर्थ अंधविश्वास नहीं है। श्रद्धा विवेक के साथ चलती है। यह वह आंतरिक शक्ति है जो कहती है—“मैं जो कर रहा हूँ, उसका कोई अर्थ है। भले ही आज परिणाम न दिखे, पर दिशा सही है।” यही भाव व्यक्ति को स्थिरता देता है। स्थिरता से ही स्पष्टता जन्म लेती है। जो व्यक्ति हर समय डगमगाता रहता है, उसका लक्ष्य कभी साफ नहीं हो सकता।

आज का समाज परिणामों की पूजा करता है, प्रक्रिया की नहीं। लोग पूछते हैं—“कितना कमा रहे हो?”, “कहाँ पहुँच गए?”—पर कोई यह नहीं पूछता कि तुम क्या बन रहे हो। जब व्यक्ति बाहरी मानदंडों से अपना मूल्यांकन करने लगता है, तब उसका लक्ष्य भी बाहरी हो जाता है। बाहरी लक्ष्य कभी आत्मा को संतुष्टि नहीं देते, इसलिए वे धुंधले ही रहते हैं।

लक्ष्य स्पष्ट न रहने का एक कारण यह भी है कि हम असफलता से डरते हैं। श्रद्धा वाला व्यक्ति असफलता को भी सीख मानता है, लेकिन श्रद्धाहीन व्यक्ति उसे अपनी योग्यता पर प्रश्नचिह्न मान लेता है। डर लक्ष्य को छोटा कर देता है, या फिर इतना बड़ा बना देता है कि वह धुंधला हो जाए। डर के वातावरण में स्पष्ट निर्णय संभव नहीं होता।

गीता हमें सिखाती है कि श्रद्धा कर्म से आती है। जब हम छोटे-छोटे कर्म पूरे मन से करते हैं, तो भीतर विश्वास जन्म लेता है। वही विश्वास आगे चलकर बड़े लक्ष्य को आकार देता है। जो व्यक्ति केवल सोचता है, पर करता नहीं—उसकी श्रद्धा भी कल्पना बनकर रह जाती है।

एक और महत्वपूर्ण कारण है अधैर्य। आज सब कुछ तुरंत चाहिए—सफलता भी, पहचान भी, संतोष भी। लेकिन लक्ष्य का बीज समय मांगता है। श्रद्धा वह धैर्य देती है जो समय के साथ लक्ष्य को स्पष्ट करता है। बिना श्रद्धा के व्यक्ति बीच रास्ते में ही दिशा बदल लेता है और फिर शिकायत करता है कि उसे कभी अपना लक्ष्य मिला ही नहीं।

वास्तव में लक्ष्य बाहर से नहीं मिलता, वह भीतर से उभरता है। और भीतर से वही चीज़ उभरती है, जिस पर हम श्रद्धा रखते हैं। यदि श्रद्धा धन में है, तो लक्ष्य धन होगा। यदि श्रद्धा सेवा में है, तो लक्ष्य सेवा होगा। यदि श्रद्धा केवल तुलना में है, तो लक्ष्य हमेशा भ्रम में रहेगा।

अंततः यह समझना आवश्यक है कि लक्ष्य का स्पष्ट होना कोई बौद्धिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आध्यात्मिक स्थिति है। जब मन, बुद्धि और हृदय एक दिशा में हो जाते हैं, तभी लक्ष्य स्पष्ट होता है। और यह एकता केवल श्रद्धा से आती है।

इसलिए यदि जीवन में लक्ष्य स्पष्ट नहीं है, तो स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए—“क्या मुझे अपने कर्म पर श्रद्धा है? क्या मुझे अपने भीतर की आवाज़ पर भरोसा है?” जिस दिन यह भरोसा जागेगा, उसी दिन दिशा अपने आप स्पष्ट होने लगेगी।

क्योंकि गीता का वचन अटल है—
📖 श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम् — श्रद्धा से ही ज्ञान, दिशा और लक्ष्य प्राप्त होता है।

क्रमशः 

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