मनुस्मृति अध्याय-1


ऋषिगण बोले—
हे महामुने! आप प्रजा के आदि-आचार्य हैं। ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं। हम सब आपके समीप एक ही प्रश्न लेकर आए हैं। इस लोक में धर्म को लेकर बड़ा भ्रम है। लोग अपने-अपने अनुसार नियम बना रहे हैं। कृपा करके हमें बताइए—धर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है? उसका मूल स्रोत क्या है? और मनुष्य को जीवन किस मार्ग पर चलना चाहिए?

मनु बोले—
हे महर्षियों! तुम लोगों का यह प्रश्न अत्यंत गंभीर है और लोक-कल्याण से जुड़ा है। धर्म का ज्ञान वही दे सकता है, जिसने उसे स्वयं जिया हो। मैं जो कुछ कहूँगा, वह न मेरी कल्पना है, न मेरा मत; वह वही है जो ब्रह्मा से प्राप्त हुआ और जो अनादि काल से परंपरा में चला आ रहा है।

ऋषि बोले—
हे मनु! सबसे पहले हमें यह बताइए कि यह सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई? क्योंकि जब तक सृष्टि का मूल न समझा जाए, तब तक धर्म का अर्थ भी स्पष्ट नहीं होता।

मनु बोले—
सृष्टि के प्रारंभ में न दिन था, न रात थी। न सत्य था, न असत्य का भेद। सब कुछ अव्यक्त था—गहन अंधकार में डूबा हुआ। न कोई नाम था, न रूप। तब स्वयंभू ब्रह्मा ने अपनी इच्छा से उस अव्यक्त को व्यक्त किया। तप किया, विचार किया और सृष्टि को गति दी।

ऋषि बोले—
तो क्या सृष्टि किसी आकस्मिक घटना का परिणाम नहीं है?

मनु बोले—
नहीं। सृष्टि व्यवस्था है, संयोग नहीं। ब्रह्मा ने पहले महत्तत्त्व को उत्पन्न किया, फिर अहंकार, फिर मन, बुद्धि और इंद्रियाँ। पंचमहाभूत प्रकट हुए—आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। इन्हीं से समस्त चर-अचर की रचना हुई।

ऋषि बोले—
और जीवों में भिन्नता कैसे आई? कोई सुखी, कोई दुखी, कोई ज्ञानी, कोई अज्ञानी—यह भेद क्यों?

मनु बोले—
यह भेद कर्म और गुणों से उत्पन्न हुआ। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण हैं। इन्हीं के संयोग से स्वभाव बनता है। कोई सत्त्व प्रधान होकर ज्ञान की ओर झुकता है, कोई रज प्रधान होकर कर्म और भोग में रत होता है, और कोई तम प्रधान होकर अज्ञान में डूब जाता है।

ऋषि बोले—
तो क्या धर्म भी इन्हीं गुणों पर आधारित है?

मनु बोले—
धर्म गुणों से ऊपर है, पर गुणों को नियंत्रित करता है। धर्म वह नियम है जो सृष्टि को संतुलन में रखता है। यदि धर्म न हो, तो सत्त्व भी अहंकार बन जाए, रज लोभ बन जाए और तम विनाश बन जाए।

ऋषि बोले—
हे मनु! लोग पूछते हैं—धर्म का प्रमाण क्या है? कौन तय करेगा कि क्या धर्म है और क्या अधर्म?

मनु बोले—
धर्म के चार प्रमाण हैं।
पहला—वेद।
दूसरा—स्मृति।
तीसरा—सज्जनों का आचरण।
और चौथा—शुद्ध अंतरात्मा की स्वीकृति।
जो वेद के विरुद्ध है, वह धर्म नहीं। जो सदाचारी जन नहीं अपनाते, वह धर्म नहीं। और जिसे अंतरात्मा अस्वीकार करे, वह भी धर्म नहीं।

ऋषि बोले—
पर हे मनु! समय के साथ वेद को समझने वाले कम हो जाते हैं। तब समाज कैसे चलेगा?

मनु बोले—
इसीलिए स्मृतियाँ हैं। स्मृति वेद का व्यवहारिक रूप है। समय, स्थान और समाज के अनुसार धर्म को जीवन में उतारने का माध्यम है। पर स्मृति भी वेद के अधीन है, उसके ऊपर नहीं।

ऋषि बोले—
हे महात्मन्! समाज की रचना कैसे हुई? वर्णों की व्यवस्था क्यों बनाई गई?

मनु बोले—
समाज शरीर के समान है। शरीर में सिर, भुजाएँ, जंघाएँ और चरण—सबका अपना-अपना कार्य है। इसी प्रकार समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की व्यवस्था बनी। यह जन्म से नहीं, कर्म और गुण से निर्धारित है।

ऋषि बोले—
तो क्या कोई भी व्यक्ति किसी भी वर्ण में जा सकता है?

मनु बोले—
यदि उसमें वे गुण हों, तो हाँ। ब्राह्मण ज्ञान, संयम और तप से बनता है। क्षत्रिय शौर्य और रक्षा से। वैश्य पालन और व्यापार से। शूद्र सेवा और सहयोग से। वर्ण का उद्देश्य ऊँच-नीच नहीं, बल्कि व्यवस्था है।

ऋषि बोले—
लेकिन लोग वर्ण को श्रेष्ठता का आधार बना लेते हैं।

मनु बोले—
जो ऐसा करता है, वह धर्म नहीं, अहंकार का पालन करता है। जहाँ कर्तव्य छूट जाए और केवल अधिकार बचे रहें, वहीं से अधर्म शुरू होता है।

ऋषि बोले—
हे मनु! मनुष्य का जीवन किस लिए है? केवल भोग के लिए या कुछ और?

मनु बोले—
मनुष्य जीवन तप, कर्तव्य और आत्मोन्नति के लिए है। इसलिए चार आश्रम बनाए गए—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। जीवन को सीढ़ियों की तरह समझो, जहाँ प्रत्येक चरण अगले की तैयारी है।

ऋषि बोले—
क्या गृहस्थ ही सबसे महत्वपूर्ण आश्रम है?

मनु बोले—
गृहस्थ समाज की धुरी है। वही ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी को पोषण देता है। पर यदि गृहस्थ धर्महीन हो जाए, तो पूरी व्यवस्था ढह जाती है।

ऋषि बोले—
हे मनु! यदि राजा अधर्मी हो जाए, तो समाज का क्या होगा?

मनु बोले—
राजा धर्म का रक्षक है, स्वामी नहीं। यदि राजा धर्म से हटे, तो प्रजा को दुख मिलता है और राजा स्वयं पतन की ओर जाता है। दंड का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, सुधार होना चाहिए।

ऋषि बोले—
क्या मनुस्मृति केवल नियमों का ग्रंथ है?

मनु बोले—
नहीं। यह आत्मा को अनुशासित करने का शास्त्र है। जो केवल दंड देखता है, वह डरता है। जो धर्म देखता है, वह स्वयं नियंत्रित होता है।

ऋषि बोले—
हे महामुने! आज के युग में लोग आपके नाम से डरते हैं। कहते हैं कि यह ग्रंथ कठोर है।

मनु बोले—
कठोरता वहाँ होती है, जहाँ करुणा न हो। पर करुणा बिना नियम के अराजकता बन जाती है। मनुस्मृति का उद्देश्य मनुष्य को बाँधना नहीं, सँभालना है।

ऋषि बोले—
तो क्या यह ग्रंथ सभी युगों के लिए समान है?

मनु बोले—
तत्त्व शाश्वत हैं, पर प्रयोग युगानुसार बदलते हैं। जो श्लोक के भाव को समझे बिना केवल शब्द पकड़े, वह अन्याय करेगा।

ऋषि बोले—
हे मनु! अंत में हमें बताइए—धर्म का सार क्या है?

मनु बोले—
धर्म का सार है—
अपने कर्तव्य को जानना,
दूसरे के अधिकार का सम्मान करना,
और आत्मा की आवाज़ को दबाना नहीं।
जहाँ यह तीनों हैं, वहीं धर्म है।

ऋषिगण बोले—
हे मनु! आपने हमारे संशय दूर कर दिए। अब हमें ज्ञात हुआ कि प्रथम अध्याय केवल भूमिका नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मनुस्मृति की आत्मा है।

मनु बोले—
यदि यह आत्मा समझ ली जाए, तो आगे का कोई भी नियम अन्याय नहीं लगेगा। क्योंकि धर्म का मूल भय नहीं, विवेक है।

क्रमशः 

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