श्रेष्ठ युवा कौन?
श्रेष्ठ युवा कौन?
📖 “स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः।” — श्रीमद्भगवद्गीता (3.35)
🪔 कर्तव्यनिष्ठ युवा।
🌼 जो अपने दायित्व से भागता नहीं।
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समाज, राष्ट्र और सभ्यता का भविष्य युवा पीढ़ी के कंधों पर टिका होता है। युवा केवल आयु का नाम नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा, संकल्प, साहस और उत्तरदायित्व का प्रतीक है। परंतु प्रश्न यह है कि श्रेष्ठ युवा कौन है? क्या वह जो केवल अधिकारों की बात करता है, या वह जो अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि मानता है? श्रीमद्भगवद्गीता का यह अमर श्लोक— “स्वधर्मे निधनं श्रेयः”—हमें स्पष्ट दिशा देता है कि श्रेष्ठता का मापदंड कर्तव्यनिष्ठा है, न कि सुविधाभोग।
श्रेष्ठ युवा वही है जो अपने स्वधर्म को पहचानता है। स्वधर्म का अर्थ केवल जाति, पेशा या सामाजिक भूमिका नहीं, बल्कि वह कर्तव्य है जो परिस्थितियों, क्षमता और अंतरात्मा से जन्म लेता है। विद्यार्थी का स्वधर्म अध्ययन है, किसान का स्वधर्म परिश्रम, सैनिक का स्वधर्म राष्ट्ररक्षा और नागरिक का स्वधर्म समाज के प्रति उत्तरदायित्व। जो युवा अपने स्वधर्म से विमुख होकर दूसरों की भूमिका की नकल करता है, वह अंततः भ्रम और असंतोष का शिकार बनता है।
आज का युग विकल्पों का युग है, पर साथ ही भ्रम का भी। सोशल मीडिया, दिखावटी सफलता और त्वरित प्रसिद्धि ने युवाओं को यह सिखा दिया है कि सफलता शॉर्टकट से मिलती है। ऐसे समय में कर्तव्यनिष्ठ युवा वह है जो आकर्षणों के बीच भी अपने पथ पर स्थिर रहता है। वह जानता है कि परधर्म—अर्थात् दूसरों की राह—भयावह है, क्योंकि वह व्यक्ति को उसके मूल स्वभाव से दूर कर देती है।
श्रेष्ठ युवा कठिनाइयों से नहीं डरता। वह जानता है कि संघर्ष जीवन का शिक्षक है। गीता का संदेश है कि अपने कर्तव्य में मृत्यु भी श्रेष्ठ है, क्योंकि कर्तव्यपथ पर किया गया त्याग आत्मसम्मान और आत्मशांति देता है। ऐसा युवा असफलताओं को अपमान नहीं, बल्कि अनुभव मानता है। वह गिरकर उठता है, पर मार्ग नहीं छोड़ता।
कर्तव्यनिष्ठ युवा केवल अपने लिए नहीं जीता। उसके भीतर सामाजिक चेतना होती है। वह परिवार के प्रति उत्तरदायी होता है, माता-पिता का सम्मान करता है, गुरु का आदर करता है और समाज की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझता है। वह जानता है कि राष्ट्र निर्माण केवल नारों से नहीं, बल्कि ईमानदार कर्म से होता है। स्वच्छता, अनुशासन, ईमानदारी और करुणा—ये उसके जीवन के मूल मूल्य होते हैं।
श्रेष्ठ युवा का चरित्र उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। वह नैतिकता से समझौता नहीं करता, चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही कठिन क्यों न हों। आज जब भ्रष्टाचार, अनैतिक प्रतिस्पर्धा और तात्कालिक लाभ का बोलबाला है, तब कर्तव्यनिष्ठ युवा दीपक की तरह अंधकार में प्रकाश फैलाता है। वह सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखता है।
ऐसा युवा आत्मनिर्भर होता है, पर अहंकारी नहीं। वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होता है, पर कर्तव्यों से विमुख नहीं। वह जानता है कि अधिकार कर्तव्य से जन्म लेते हैं। बिना कर्तव्य निभाए अधिकार की माँग करना खोखली सोच है। श्रेष्ठ युवा पहले देता है, फिर पाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से भी श्रेष्ठ युवा वही है जो कर्मयोग को अपनाता है। वह फल की चिंता किए बिना कर्म करता है। उसकी साधना केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि कर्म को ही पूजा बनाना उसका लक्ष्य होता है। वह अपने कार्यस्थल, अध्ययन कक्ष और समाज को ही तपोभूमि मानता है।
अंततः, श्रेष्ठ युवा वह है जो अपने जीवन को अर्थपूर्ण बनाता है। वह भागता नहीं, टालता नहीं, बल्कि सामना करता है। वह जानता है कि जीवन की सार्थकता आराम में नहीं, उत्तरदायित्व में है। स्वधर्मे निधनं श्रेयः का भाव उसके जीवन का मंत्र बन जाता है।
निष्कर्षतः, श्रेष्ठ युवा कोई विशेष वर्ग या पद नहीं, बल्कि एक चेतना है—कर्तव्यनिष्ठा की चेतना। जब युवा अपने दायित्व को सम्मान समझकर निभाता है, तब वही युवा समाज का आधार, राष्ट्र की रीढ़ और भविष्य की आशा बनता है। यही श्रेष्ठ युवा है—जो अपने कर्तव्य से भागता नहीं, बल्कि उसे जीवन का सर्वोच्च धर्म मानता है।
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