19. युवा भटक क्यों जाता है?

19. युवा भटक क्यों जाता है?
(भगवद्गीता 3.37 के आलोक में)

मनुष्य का जीवन विशेषकर युवावस्था ऊर्जा, उत्साह और असीम संभावनाओं से भरी होती है। यही वह काल है जब व्यक्ति अपने भविष्य की दिशा तय करता है। परंतु यह भी सत्य है कि यही अवस्था सबसे अधिक भटकाव की शिकार होती है। आज का युवा पढ़ा-लिखा, तकनीकी रूप से सक्षम और जागरूक होने के बावजूद मानसिक अशांति, भ्रम और असंतोष से जूझ रहा है। प्रश्न उठता है—आख़िर युवा भटक क्यों जाता है? इस प्रश्न का उत्तर हमें श्रीमद्भगवद्गीता के गूढ़ ज्ञान में मिलता है।

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
“रजोगुणसमुद्भवः कामः क्रोधोऽभिजायते” (गीता 3.37)
अर्थात् यह काम (वासना/इच्छा) और क्रोध रजोगुण से उत्पन्न होते हैं और यही मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं।

रजोगुण और मनुष्य का पतन

भारतीय दर्शन के अनुसार प्रकृति के तीन गुण हैं—सत्त्व, रज और तम। रजोगुण का स्वभाव है—चंचलता, इच्छा, आकांक्षा और भोग की लालसा। युवावस्था में रजोगुण अत्यधिक सक्रिय होता है। यही कारण है कि युवा निरंतर कुछ पाने, कुछ बनने और कुछ भोगने की चाह में रहता है। यह चाह जब संतुलन में होती है तो प्रगति का कारण बनती है, किंतु जब असंयमित हो जाती है, तब यही चाह युवाओं को भटका देती है।

काम-आसक्ति: भटकाव का मूल कारण

भगवान कृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि काम-आसक्ति ही पतन का मूल कारण है। आज का युवा सुख, सुविधा, धन, प्रसिद्धि और भोग को ही जीवन का लक्ष्य मान बैठा है। सोशल मीडिया, विज्ञापन और उपभोक्तावादी संस्कृति इस आग में घी डालने का काम करती है। हर समय तुलना—कौन कितना सफल है, कौन कितना अमीर है—युवाओं के मन में असंतोष पैदा करती है।

जब इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, तो वही काम क्रोध में बदल जाता है। क्रोध से विवेक नष्ट होता है, और विवेक के नष्ट होते ही व्यक्ति गलत निर्णय लेने लगता है। यही वह क्षण होता है जब युवा सही मार्ग से भटक जाता है।

असंयमित इच्छाएँ और आत्मविस्मृति

युवा का भटकाव केवल बाहरी कारणों से नहीं होता, बल्कि आंतरिक असंतुलन भी इसका बड़ा कारण है। असंयमित इच्छाएँ मनुष्य को स्वयं से दूर कर देती हैं। वह यह भूल जाता है कि वह कौन है, उसका उद्देश्य क्या है और उसका कर्तव्य क्या है। जब जीवन का लक्ष्य केवल भोग बन जाता है, तब मूल्य, संस्कार और चरित्र गौण हो जाते हैं।

आज अनेक युवा नशा, हिंसा, अवसाद और अनैतिक मार्गों की ओर बढ़ रहे हैं। इसका मूल कारण यही है कि इच्छाओं पर संयम नहीं है और मन को दिशा देने वाला कोई आंतरिक अनुशासन नहीं है।

मार्गदर्शन का अभाव और दिशाहीनता

पूर्वकाल में परिवार, समाज और गुरु युवाओं को जीवन की सही दिशा देते थे। आज संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, संवाद कम हो रहा है और गुरु-शिष्य परंपरा कमजोर पड़ रही है। परिणामस्वरूप युवा बाहरी आकर्षणों को ही अपना मार्गदर्शक बना लेते हैं। बिना विवेक के अपनाया गया कोई भी मार्ग अंततः भ्रम और पीड़ा ही देता है।

समाधान: गीता का मार्ग

भगवद्गीता केवल दर्शन नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। श्रीकृष्ण युवा को यह नहीं कहते कि इच्छाओं को समाप्त कर दो, बल्कि यह सिखाते हैं कि इच्छाओं पर नियंत्रण रखो।

1. संयम – इंद्रियों और मन पर नियंत्रण ही सच्ची स्वतंत्रता है।


2. कर्तव्यबोध – अपने धर्म और उत्तरदायित्व को समझना।


3. सत्त्वगुण की वृद्धि – सत्संग, स्वाध्याय और सेवा से मन शुद्ध होता है।


4. आत्मचिंतन – स्वयं से प्रश्न करना कि मैं क्या कर रहा हूँ और क्यों कर रहा हूँ।



युवा शक्ति का सही उपयोग

युवा शक्ति राष्ट्र की सबसे बड़ी संपदा है। यदि यही शक्ति भ्रम, भोग और असंयम में नष्ट हो जाए, तो समाज और राष्ट्र दोनों कमजोर हो जाते हैं। परंतु यदि यही युवा विवेक, संयम और उद्देश्य के साथ आगे बढ़े, तो वही युवा परिवर्तन का वाहक बन सकता है।

निष्कर्ष

युवा का भटकाव कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि असंयमित इच्छाओं, काम-आसक्ति और विवेकहीनता का परिणाम है। गीता 3.37 हमें चेतावनी देती है कि काम और क्रोध को अपना शत्रु समझो। जब युवा अपने भीतर झाँककर इच्छाओं को नियंत्रित करना सीख लेता है, तब उसका जीवन स्वयं ही सही दिशा पकड़ लेता है।

अतः समाधान बाहर नहीं, भीतर है।
संयम ही मार्ग है,
विवेक ही दीपक है,
और आत्मज्ञान ही वह शक्ति है जो युवा को भटकने से बचा सकती है।

क्रमशः 

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