18. मार्गदर्शन क्यों जरूरी?


गीता के चतुर्थ अध्याय का 34वां श्लोक जीवन की सफलता का आधार स्तंभ है। "तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया" का संदेश केवल आध्यात्मिक जगत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यावहारिक जीवन की उन्नति के लिए एक अनिवार्य ब्लूप्रिंट है।
यहाँ हम विस्तार से समझेंगे कि मार्गदर्शन क्यों जरूरी है और एक गुरु या मार्गदर्शक हमारे जीवन की दिशा को कैसे बदल देता है।
1. मार्गदर्शन: अंधेरे में प्रकाश की किरण
जीवन एक विशाल महासागर की तरह है जहाँ बिना दिशा-निर्देश के हम केवल भटक सकते हैं। जैसे एक जहाज को किनारे तक पहुँचने के लिए 'लाइटहाउस' की आवश्यकता होती है, वैसे ही मनुष्य को अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।
तद्विद्धि प्रणिपातेन का अर्थ है कि उस ज्ञान को तुम विनम्रतापूर्वक गुरु के पास जाकर सीखो। यह विनम्रता ही वह द्वार है जहाँ से ज्ञान का प्रवेश होता है। मार्गदर्शन इसलिए जरूरी है क्योंकि:
 * यह हमें अनुभव का निचोड़ प्रदान करता है।
 * यह हमें उन गलतियों से बचाता है जो दूसरे पहले ही कर चुके हैं।
 * यह हमारी ऊर्जा को एक निश्चित दिशा में केंद्रित करता है।
2. अनुभव रहित ऊर्जा: एक बेलगाम घोड़ा
ऊर्जा और उत्साह युवाओं की शक्ति है, लेकिन अनुभव के बिना यह ऊर्जा 'दिशाहीन' होती है। कल्पना कीजिए कि आपके पास एक बहुत शक्तिशाली इंजन है, लेकिन अगर पटरी सही दिशा में नहीं बिछी है, तो वह इंजन केवल विनाश का कारण बनेगा।
मार्गदर्शन इस 'ऊर्जा' और 'अनुभव' के बीच का सेतु है।
 * ऊर्जा (Energy): जोश, गति और कार्य करने की क्षमता।
 * मार्गदर्शन (Guidance): सही समय पर सही निर्णय लेने की समझ।
जब तक ऊर्जा को गुरु या मार्गदर्शक की दृष्टि नहीं मिलती, वह केवल 'श्रम' बनकर रह जाती है, 'सफलता' नहीं बन पाती। अर्जुन के पास अपार ऊर्जा और कौशल था, लेकिन युद्ध के मैदान में वह भ्रमित थे। श्री कृष्ण के मार्गदर्शन ने उनकी उस ऊर्जा को धर्म की स्थापना की दिशा दी।
3. गुरु से दिशा: सत्य का साक्षात्कार
अक्सर हम अपनी क्षमताओं को नहीं पहचान पाते। गुरु या मार्गदर्शक एक दर्पण की तरह काम करता है। वह हमें वह दिखाता है जो हम खुद में नहीं देख पा रहे होते।
गुरु से दिशा मिलने के लाभ:
 * संशय का नाश: मन में उठने वाले 'क्या' और 'कैसे' के तूफानों को गुरु का अनुभव शांत करता है।
 * समय की बचत: खुद प्रयोग करके सीखने में वर्षों लग सकते हैं, जबकि एक अनुभवी मार्गदर्शक हमें कम समय में लक्ष्य तक पहुँचा देता है।
 * दृष्टिकोण का विस्तार: हम अक्सर छोटी सोच या तात्कालिक समस्याओं में फंस जाते हैं, गुरु हमें 'बड़ी तस्वीर' (The Big Picture) देखने में मदद करते हैं।
4. प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवा: ज्ञान की त्रिवेणी
गीता के इस सूत्र में मार्गदर्शन प्राप्त करने की पद्धति बताई गई है:
 * प्रणिपात (Humility): अहंकार का त्याग। जब तक कप भरा हुआ है, उसमें कुछ नया नहीं डाला जा सकता। झुकना कमजोरी नहीं, बल्कि सीखने की तत्परता है।
 * परिप्रश्न (Inquiry): आँख मूंदकर विश्वास करना मार्गदर्शन नहीं है। तर्कपूर्ण प्रश्न पूछना और अपनी जिज्ञासाओं को शांत करना जरूरी है।
 * सेवा (Selfless Service): जब हम किसी के प्रति सेवा भाव रखते हैं, तो हमारा जुड़ाव गहरा होता है और ज्ञान का हस्तांतरण (transfer) सहज हो जाता है।
5. आधुनिक संदर्भ में मार्गदर्शन की आवश्यकता
आज की सूचना क्रांति के दौर में जानकारी (Information) तो हर जगह है, लेकिन ज्ञान (Wisdom) दुर्लभ है। इंटरनेट पर करोड़ों लेख हैं, लेकिन वे आपको यह नहीं बता सकते कि आपके लिए क्या सही है।
 * करियर में: एक मेंटर आपको उद्योग की बारीकियां सिखाता है जो किताबों में नहीं मिलतीं।
 * मानसिक स्वास्थ्य में: जब हम तनाव में होते हैं, तो एक सही मार्गदर्शक हमारी सोच को सकारात्मक दिशा देता है।
 * चारित्रिक विकास में: सही संगति और मार्गदर्शन हमारे व्यक्तित्व को निखारते हैं।
निष्कर्ष: जीवन की सार्थकता
मार्गदर्शन का अर्थ यह नहीं है कि कोई और आपके लिए चलेगा, बल्कि इसका अर्थ यह है कि कोई आपको वह रास्ता दिखाएगा जिस पर चलकर आप अपनी मंजिल तक पहुँच सकें। बिना दिशा के श्रम 'बोझ' है, और सही दिशा के साथ श्रम 'तपस्या' है।
जिस प्रकार एक मूर्तिकार पत्थर के भीतर छिपी हुई प्रतिमा को देख लेता है और केवल फालतू पत्थर को हटाता है, उसी प्रकार एक गुरु हमारे भीतर के दोषों को हटाकर हमारे वास्तविक स्वरूप को प्रकट करता है। इसलिए, यदि जीवन में ऊंचाइयों को छूना है, तो एक सच्चे मार्गदर्शक की शरण में जाना अनिवार्य है।
> "ज्ञान प्राप्त करना महत्वपूर्ण है, लेकिन उस ज्ञान को किस दिशा में लगाना है, यह मार्गदर्शन से ही तय होता है।"
क्रमशः

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