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ये पांच राशि के जातक रहे सावधान

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फरवरी में बनेगा खतरनाक ग्रहण और अंगारक योग, 5 राशियां रहें अलर्ट वैदिक ज्योतिष के अनुसार ग्रहण योग और अंगारक योग को बहुत असरदार लेकिन ज्यादातर अशुभ योग माना जाता है. ये योग ग्रहों के आपस में मिलने से बनते हैं. जब ये योग बनते हैं, तो इसका प्रभाव व्यक्ति के जीवन, मन की स्थिति, सेहत, नौकरी-कारोबार और पारिवारिक रिश्तों पर साफ दिखाई देने लगता है. फरवरी के महीने में ग्रहों की स्थिति कुछ अशुभ योगों का निर्माण करने जा रही है. इस दौरान सूर्य, मंगल और राहु की युति से एक साथ अंगारक योग और ग्रहण योग बनेंगे. दरअसल, फरवरी के पहले हफ्ते में मंगल कुंभ राशि में प्रवेश करेंगे, जहां पहले से राहु मौजूद रहेंगे. मंगल और राहु के एक साथ आने से अंगारक योग बनेगा. वहीं 13 फरवरी को सूर्य भी कुंभ राशि में प्रवेश करेंगे, वो राहु के साथ युति बनाकर ग्रहण योग का निर्माण करेंगे. ज्योतिष शास्त्र में इन दोनों योगों को अशुभ प्रभाव देने वाला माना गया है. ऐसे में फरवरी का समय मेष, सिंह और वृश्चिक सहित कुछ राशियों के लिए चुनौतीपूर्ण रह सकता है. इस दौरान दुर्घटना, तनाव और मानसिक परेशानी की आशंका बढ़ सकती है. आइए ...

किन तीन राशियों पर होंगी शुक्र की महरबानी

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पैसा, नाम और शोहरत, 3 राशियों पर आज से शुक्र रहेंगे खास मेहरबान जानें कौनसी हैं वे तीन राशियां. शुक्र और वरुण आज अर्धकेंद्र योग का निर्माण करेंगे. यह योग तीन राशियों मेष, मकर और मीन राशि के जातकों के लिए आर्थिक उन्नति, धन लाभ और वित्तीय स्थिरता लेकर आएगा. यह समय सही फैसले लेने और भविष्य के लिए मजबूत आर्थिक आधार तैयार करने का है.  वैदिक ज्योतिष में जब धन, वैभव और सुख-सुविधाओं के कारक ग्रह शुक्र किसी विशेष कोण पर किसी दीर्घकालिक प्रभाव वाले ग्रह से संबंध बनाते हैं, तो उसका सीधा असर व्यक्ति की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है. ऐसा ही एक महत्वपूर्ण ज्योतिषीय संयोग आज शाम में बन रहा है, जिसे अर्धकेंद्र योग कहा जाता है. यह योग धन वृद्धि, आय के नए स्रोत और आर्थिक स्थिरता का संकेत माना जाता है. 29 जनवरी 2026, शाम 6 बजकर 6 मिनट पर शुक्र और वरुण ग्रह एक-दूसरे से 45 डिग्री के कोण पर होंगे, जिससे अर्धकेंद्र योग का निर्माण होगा. वर्तमान समय में शुक्र मकर राशि में शनि के साथ विराजमान हैं, जहां सूर्य, बुध और मंगल की भी उपस्थिति है. वहीं वरुण ग्रह मीन राशि में स्थित हैं. वरुण एक धीमी गति वाल...

अलसी का सेवन कैसे करें

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*फ्लैक्स सीड - अलसी* *जानिये, अलसी सेवन का तरीका* ● हमें प्रतिदिन 30–60 ग्राम अलसी का सेवन करना चाहिये। ● 30 ग्राम आदर्श मात्रा है। ● अलसी को रोज मिक्सी के ड्राई ग्राइंडर में पीसकर आटे में मिलाकर रोटी, पराँठा आदि बनाकर खाना चाहिये। ● डायबिटीज के रोगी सुबह शाम अलसी की रोटी खायें। ■ कैंसर में बुडविग आहार-विहार की पालना पूरी श्रद्धा और पूर्णता से करना चाहिये। ● इससे ब्रेड, केक, कुकीज, आइसक्रीम, चटनियाँ, लड्डू आदि स्वादिष्ट व्यंजन भी बनाये जाते हैं। *■ दूसरा तरीका..* ● आप अलसी को सूखी कढ़ाई में डालिये, रोस्ट कीजिये (अलसी रोस्ट करते समय चट चट की आवाज करती है) और मिक्सी से पीस लीजिये। ● इन्हें थोड़े दरदरे पीसिये, एकदम बारीक मत कीजिये। ● भोजन के बाद सौंफ की तरह इसे खाया जा सकता है। ● लेकिन आप इसे जादा मात्रा में बना के न रक्खे क्युकि ये खराब हो जाती है। एक हफ्ते के लिए बनाना ही चाहिए। ● अलसी आपको अनाज बेचने वाले तथा पंसारी या आयुर्वेदिक जड़ी बूटी बेचने वालो के यहाँ से मिल जायेगी। ● अलसी की पुल्टिस का प्रयोग गले एवं छाती के दर्द, सूजन तथा निमोनिया और पसलियों के दर्द में लगाकर किया ज...

पिता का सुनापन

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Father's loneliness पिता… जो घर में होते हुए भी अकेले रह जाते हैं, घर में सब कुछ था, छत थी, दीवारें थीं, रसोई की खुशबू थी, हँसी-मज़ाक की आवाज़ें थीं, टीवी चलता था, मोबाइल बजते थे। बस एक चीज़ नहीं थी— पिता की अहमियत। शिवनारायण जी रोज़ की तरह सुबह सबसे पहले उठे थे सूरज अभी ठीक से निकला भी नहीं था उन्होंने चुपचाप दरवाज़ा खोला बाहर झाड़ू लगाई, आँगन में तुलसी को पानी दिया,  घर सो रहा था, और पिता… हमेशा की तरह जागते हुए भी अकेले थे। कभी-कभी कोई चीज़ इतनी हमेशा साथ रहती हैं कि उसका होना हमें दिखना बंद हो जाता है। पिता भी वैसे ही होते हैं, वे घर की नींव होते हैं— मजबूत, स्थिर, पर नींव को कौन देखता है? अगर बेटा बाहर हो, तो पिता बार-बार घड़ी देखते हैं फोन उठाकर रखते हैं दिल में आशंका, मन में डर। अगर बेटी घर से बाहर जाए, तो पिता का दिल उसके साथ चला जाता है, पर अगर पिता बाहर हों— तो घर चलता रहता है,  कोई खालीपन नहीं, कोई बेचैनी नहीं, जैसे पिता का होना सिर्फ़ एक सुविधा बन गया हो, एक स्थायी वस्तु। शिवनारायण जी कुर्सी पर बैठे थे हाथ में अख़बार था तो सही पर नज़र शब्दों पर नहीं थी,...

श्रेष्ठ युवा कौन?

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श्रेष्ठ युवा कौन? 📖 “स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः।” — श्रीमद्भगवद्गीता (3.35) 🪔 कर्तव्यनिष्ठ युवा। 🌼 जो अपने दायित्व से भागता नहीं। --- समाज, राष्ट्र और सभ्यता का भविष्य युवा पीढ़ी के कंधों पर टिका होता है। युवा केवल आयु का नाम नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा, संकल्प, साहस और उत्तरदायित्व का प्रतीक है। परंतु प्रश्न यह है कि श्रेष्ठ युवा कौन है? क्या वह जो केवल अधिकारों की बात करता है, या वह जो अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि मानता है? श्रीमद्भगवद्गीता का यह अमर श्लोक— “स्वधर्मे निधनं श्रेयः”—हमें स्पष्ट दिशा देता है कि श्रेष्ठता का मापदंड कर्तव्यनिष्ठा है, न कि सुविधाभोग। श्रेष्ठ युवा वही है जो अपने स्वधर्म को पहचानता है। स्वधर्म का अर्थ केवल जाति, पेशा या सामाजिक भूमिका नहीं, बल्कि वह कर्तव्य है जो परिस्थितियों, क्षमता और अंतरात्मा से जन्म लेता है। विद्यार्थी का स्वधर्म अध्ययन है, किसान का स्वधर्म परिश्रम, सैनिक का स्वधर्म राष्ट्ररक्षा और नागरिक का स्वधर्म समाज के प्रति उत्तरदायित्व। जो युवा अपने स्वधर्म से विमुख होकर दूसरों की भूमिका की नकल करता है, वह अंततः भ्रम और असंतोष...

19. युवा भटक क्यों जाता है?

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19. युवा भटक क्यों जाता है? (भगवद्गीता 3.37 के आलोक में) मनुष्य का जीवन विशेषकर युवावस्था ऊर्जा, उत्साह और असीम संभावनाओं से भरी होती है। यही वह काल है जब व्यक्ति अपने भविष्य की दिशा तय करता है। परंतु यह भी सत्य है कि यही अवस्था सबसे अधिक भटकाव की शिकार होती है। आज का युवा पढ़ा-लिखा, तकनीकी रूप से सक्षम और जागरूक होने के बावजूद मानसिक अशांति, भ्रम और असंतोष से जूझ रहा है। प्रश्न उठता है—आख़िर युवा भटक क्यों जाता है? इस प्रश्न का उत्तर हमें श्रीमद्भगवद्गीता के गूढ़ ज्ञान में मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं— “रजोगुणसमुद्भवः कामः क्रोधोऽभिजायते” (गीता 3.37) अर्थात् यह काम (वासना/इच्छा) और क्रोध रजोगुण से उत्पन्न होते हैं और यही मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं। रजोगुण और मनुष्य का पतन भारतीय दर्शन के अनुसार प्रकृति के तीन गुण हैं—सत्त्व, रज और तम। रजोगुण का स्वभाव है—चंचलता, इच्छा, आकांक्षा और भोग की लालसा। युवावस्था में रजोगुण अत्यधिक सक्रिय होता है। यही कारण है कि युवा निरंतर कुछ पाने, कुछ बनने और कुछ भोगने की चाह में रहता है। यह चाह जब संतुलन में होती है तो प्रगति...

18. मार्गदर्शन क्यों जरूरी?

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गीता के चतुर्थ अध्याय का 34वां श्लोक जीवन की सफलता का आधार स्तंभ है। "तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया" का संदेश केवल आध्यात्मिक जगत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यावहारिक जीवन की उन्नति के लिए एक अनिवार्य ब्लूप्रिंट है। यहाँ हम विस्तार से समझेंगे कि मार्गदर्शन क्यों जरूरी है और एक गुरु या मार्गदर्शक हमारे जीवन की दिशा को कैसे बदल देता है। 1. मार्गदर्शन: अंधेरे में प्रकाश की किरण जीवन एक विशाल महासागर की तरह है जहाँ बिना दिशा-निर्देश के हम केवल भटक सकते हैं। जैसे एक जहाज को किनारे तक पहुँचने के लिए 'लाइटहाउस' की आवश्यकता होती है, वैसे ही मनुष्य को अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। तद्विद्धि प्रणिपातेन का अर्थ है कि उस ज्ञान को तुम विनम्रतापूर्वक गुरु के पास जाकर सीखो। यह विनम्रता ही वह द्वार है जहाँ से ज्ञान का प्रवेश होता है। मार्गदर्शन इसलिए जरूरी है क्योंकि:  * यह हमें अनुभव का निचोड़ प्रदान करता है।  * यह हमें उन गलतियों से बचाता है जो दूसरे पहले ही कर चुके हैं।  * यह हमारी ऊर्जा को एक निश्चित दिशा में केंद्रित करता ...